24th Sep, 2026
मैं किसी भी तरह उसे टालना चाहता हूं, लेकिन वह टलती नहीं. उसके आते ही मैं कुछ का कुछ हो जाता हूं. अनाप-शनाप चीजें करने लग जाता हूं. दिनभर ऑफिस का भार अपने कंधों पर उठाना, अपनी आंखों को बेतरतीब- बेतुके दृश्यों का बोझ देना और अपने दोनों कानों को निरर्थक संवाद और शोर की आवाजाही से थका देना, रोज-रोज बस यही तो होता है. फूलों और लताओं को ऑबसेशन की हद तक रोज निहारना, हर पल उसके बढ़ने का अनुमान करना, गमलों में खाद-पानी डालने की चिंता करना, फिर कमरे पर आकर किताबों में उलझना, देर रात खा-पीकर बालकनी में आरामकुर्सी पर लेटने जैसी मुद्रा में दूर पहाड़ी की तरफ देखना, और फिर पहाड़ी की बगल से हाइवे से गुजरती गाड़ियों की हेडलाइट की चकाचैंध में सुकून ढूंढ़ना.
मुझे हमेशा सड़कों पर गुजरती गाड़ियों को रात में देखना अच्छा लगता है. रात को मुड़ती हुई पटरियों पर चलती हुई ट्रेनों को गुजरते देखने से भी एक सुकून महसूस होता है. उन कल्पनाओं में गोते लगाने जैसा कि लगे जैसे एक पूरी दुनिया उठकर चली जा रही है. पटरियों पर पहियों की आवाजें और उसकी सीटी, वह भी आधी रात को, एक अलग भाव से भर देती हैं. शायद आवाजें रात्रि के सन्नाटे में भीतर से उठते शोर को बेअसर करती हैं.
फिर लेटते हुए आंखें पंखे और सीलिंग की नक्काशियों में उलझ जाती हैं. दीवार घड़ी की टिक-टिक की आवाज अपने दिल की धड़कन की तरह चलती हुई प्रतीत होती है. पहले सारे बल्ब बुझाता हूं. पूरा अंधेरा. पर फिर बल्ब आॅन करता हूं. नाइटलाइट के तौर पर लाल रंग के बल्ब मुझे शुरू से पसंद हैं. शायद इस कारण भी ऐसा होता हो. नहीं! मैंने नीले और हरे रंग के जीरोवाट के बल्ब का प्रयोग करके भी देखा है और पूरा अंधेरा करके भी! नींद में प्रवेश करते ही लगता है जैसे मैं लाल रंग की रोशनी बिखरे शहर की सड़कों पर चल रहा होऊं. जैसे बेडौल दीवारों की आकृतियां हिलती हुईं मेरे इर्द-गिर्द मंडरा रही हों. उसी बीच अचानक किसी गली से निकलकर बड़ी-बड़ी लाल नाक वाला आदमी मेरे आगे खड़ा हो जाता है. मैं घबराकर उससे दूर भागता हूं. वह कुछ अस्फुट भाषा में बड़बड़ाता है. मुझे डरते देख हंस देता है. पर मैं हंस नहीं पाता.
मेरे सोने के तरीके में कोई दिक्कत तो नहीं? शायद नहीं. पर यह बात जरूर है कि मैं अपने कमरे में रखे उसी दीवान पर सोता हूं जिसे उस फर्नीचर शाॅप के आॅनर ने भय के कारण मुझे लगभग फ्री में दे दिया था. सब कहते हैं कि मुझसे तो खैर एक चींटी तक नहीं डर सकती, तो भला वह क्यों डरेगा? हो सकता है कि डर मेरा नहीं, मेरे पद का हो.
मेरी थकान और नींद को खुद में समेटने वाला यह दीवान सचमुच बहुत मजबूत है. सागवान की लकड़ी का बना. दीवान की दाईं तरफ लगा मिरर, हाॅल का सोफा और एक डाइनिंग टेबल, सब उसी के फर्नीचर शाॅप से आया है. कभी-कभी लगता है कि उसी का डर तो नहीं दुबक गया मेरी नींद में! इन चीजों को उठाते वक्त मुझे लगा था कि फर्नीचर वाला भीतर से रो-कलप रहा था.
साथ वाले सीनियर आॅफिसर की शह पर मैं वहां गया था. मैं नया-नया. मुझे कहां पता था कुछ? उन्होंने भी दो पलंग पसंद किए थे और मुझसे कहा था।
‘मिश्रा जी अपने सामान के लिए सात हजार निकालिए!’
‘बस! इतना ही?’
‘अरे चुप रहिए. एक पर्ची पर अपना पता लिख के दीजिए.’
फिर वे फर्नीचर शाॅप के ओनर की ओर मुखातिब हुए थे. ‘लो पकड़ो! इस साहब का हो गया ना!’
शाॅप के ओनर का चेहरा फक पड़ गया था.
‘ये लो दोनों का पता. हमारे पते पर अच्छे से पैक करके पहुंचवा देना. साथ में एक मजदूर और मिस्त्राी भी जो कमरे में पहुंचा कर सेट कर दे. पैसा कहीं ज्यादा लगे तो लौटा देना.’
उन्होंने अजीब कुटिल मुस्कान से देखा था. शाॅप ओनर डर मिश्रित मुस्कुराहट से मेरी ओर देख रहा था. बोला कुछ नहीं. उसकी आंखें मेरी आंखों में धंस गईं थीं. मैंने डिप्टी कमिश्नर वाई.पी. सिंह की ओर देखा. ‘सर इतना कम?’
‘हां तो क्या? बहुत है. साला चोर है! लाखों का टैक्स चुराता है. अभी हिसाब करने लगेंगे तो वो फेर में पड़ जाएगा. एक चीज सीख लीजिए मिश्रा जी! जजेज मस्ट बिलीव दैट दे आर डुईंग नथिंग बट जस्टिस’.
मैंने जैसे इस शहर को कई बार नंगा देखा है. नंगा और वीभत्स! आदमी भी नंगे. बेतरतीब. सब कुछ गलीज जैसा. कीचड़ और दुर्गंध से भरा. बेशर्म, खुले में पसरा हुआ है. गंदा, सूअर की तरह लटके हुए थूथन लिए इधर-उधर डोलता और थूकी हुई दीवारों की पीठ वाला. देखे हुए के सच हो जाने की तरह, जो कहीं कल्पनाओं में दुबका हो और अचानक से सामने आ जाए. पीछे से अचानक किसी दोस्त की तरह धप्पा दे दे.
‘धप्पा!’ और मैं शहर को कहूं.
‘अरे बाप रे! तुमने तो डरा दिया.’
मेरी धड़कन तेज हो गई थी. नींद में भी शायद.
मेरी आंखों में ग्रे-कलर्ड सिनेमा की तरह कुछ अजीब-सा बन जाता है. इट इज नाॅट बिकाॅज आॅफ कलर ब्लांडनेस. नींद में कई दृश्य चलने लगते हैं. सड़कें लाल हैं. मकान लाल हैं. आसमान जैसे खून से नहाया हुआ है. जैसे सब कुछ हकीकत हो. एक मुहल्ले में लोगों के सामने किसी को जिंदा जलाया जा रहा है. भीड़ तमाशबीन बनी बैठी है. हथियारबंद लोग घर को घेरे हुए हैं. धमाके की आवाजें आ रही हैं. मैं पुलिस के गश्ती दल का एक अधिकारी होकर सामने से उसे देख रहा हूं. पर कर कुछ नहीं रहा. क्या कुछ नहीं करना मेरी नियति है? काला बुर्का पहने एक खूबसूरत युवती(उसके चेहरे पर नकाब नहीं है) रोती हुई मेरे सामने आती है और कहती है ‘मेरे अब्बू को लोगों ने जला दिया. मेरी अम्मी और आपा के साथ बदतमीजी कर रहे हैं. आप क्यों नहीं कुछ कर रहे हैं?’ मैं मुस्कुराता हूं, कुछ नहीं करता. उसकी देह के कटाव को अपनी आंखों से चीथ डालता हूं.
फिर आसमान से चिंगारी झड़ रही है जैसे आग लगा आसमान. तभी एक लाल और बड़ी नाक वाला आदमी आ जाता है. हंसता है. मुझे जाने क्यों ऐसा लगता है कि जोकर मैं ही हूं. वह सामने की समूची पहाड़ी को उठाकर एक बड़े से क्रशर में डाल रहा है. पत्थरों के टूटने का भयानक स्वर चारों ओर गूंज रहा है. ढेर सारी धूल उड़ रही है. जैसे गर्दाे-गुबार का मौसम! वह उस पहाड़ी को चकनाचूर होता हुआ देखकर मुस्कुरा रहा है.
फिर उसी जोकर ने पहाड़ी जंगल के रक्षक, ईमानदार डी.एफ.ओ. संजय सिंह को फोन किया है. वह चिल्ला रहा है,
‘सर, जल्दी आइए यहां! देखिए न जंगल में अवैध कटाई चल रही है. ऐसे में तो जंगल के सारे पेड़ काट दिए जाएंगे. आपको कोई सूचना तक नहीं होगी. कहां गए आपके जासूस?’
‘मैं अभी आ रहा हूं एस.के.एम. तुम वहीं रुकना. कहीं मत जाना. इट्स एन ऑर्डर. एम आई क्लीयर?’
‘यस सर!’
और फिर अपनी बुलेट मोटरसाइकिल से डी.एफ.ओ. साहब पहुंचे हैं. उसकी बुलेट की पिछली सीट पर बैठा है एक आदिवासी युवक जो संजय सिंह का खुफिया है. मैं वहीं हूं. मेरे साथ इस क्षेत्रा के नामी मिनिस्टर ओ.पी. शर्मा का भाई और खुद को मिनिस्टर का बाप समझने वाला धनंजय शर्मा, अपने कुछ गनमैन के साथ है. कुछ आदमी पेड़ की कटाई में लगे हुए हैं. दो-तीन ट्रक थोड़ी दूर पर खड़े हैं.
संजय सिंह चिल्लाते हैं, ‘ये क्या हो रहा है?’
धनंजय शर्मा के मोटे भद्दे होंठ अजीब ढंग से खुल रहे हैं. वह हंसी को भी दबोच लेता है. मैं मुस्कुराता हूं. सारे लोगों के ठहाके गूंज रहे हैं.
‘तुम अकेले आए हो! फाॅरेस्ट गार्ड लोग को नहीं लाए?’
‘ये गार्ड लोग से ज्यादा कलुआ पर विश्वास करते हैं. यही इनका खबरीलाल है. क्यों कलवा मुर्मू सही कह रहे हैं ना!’ मैं जाने क्यों धनंजय शर्मा की बात पर टपक पड़ता हूं.
‘मिनिस्टर और उनके लगुए-भगुए का तो समझ में आता है एस.के.एम. ये लोग तो पैदाइशी धंधेबाज और हरामखोर हैं लेकिन तुम ऐसे कब हो गए?’
मुझे समझ में नहीं आता है कि क्या बोलूं? मैं चुप रहता हूं. मेरी हंसी गायब हो चुकी है.
फिर मिनिस्टर साहब के इशारे से डी.एफ.ओ. साहब और कलवा मुर्मू दोनों को पकड़ लिया जाता है. और फिर उनके हाथों को पीछे से बांधकर मुंह में पिस्टल घुसाकर गोली मारी जाती है. प्वाइंट ब्लैंक रेंज से.
‘मादरचोद! तूने ही ठेका ले लिया था ईमानदारी का? अब जरा मेरी ईमानदारी भी तो देख ले.’ यह बोलने में मिनिस्टर के भाई के मुंह से थूक लिथड़ गया है.
दोनों के सिर के पिछले हिस्से का मांस और खून के छींटे उड़ गए हैं और पास की झाड़ियों में बेतरतीब बिखर गए हैं.
‘इट्स अ ब्रूटल किलिंग. इट लुक्स लाइक ए प्लैंड डबल मर्डर. इन ब्राॅड डे लाईट बाय द नक्सल्स. वी विल टीच दैम ए हार्श लेसन. आई प्रोमिस! सारे नक्सलियों को हम पहाड़ों से उखाड़ फेकेंगे. दिस इंसीडेंस इज नथिंग बट रिटेलिएशन आॅफ गवर्मेंट्स एक्शन. इज देयर ऐनी क्वेरी?’
एस.पी. साहब प्रेस काॅन्फ्रेंस कर रहे हैं. एक पत्राकार पूछता है.
‘एस.पी. साहब पूरे इलाके में अवैध क्रशर चल रहे हैं. जंगलों के पेड़ गायब हो रहे हैं. डी.एफ.ओ. का मर्डर हो जा रहा है. कोयला माफियाओं का खेल चल ही रहा है. तब आप लोग कर क्या रहे हैं?’
मेरी नींद भक्क से खुली है. मैं हांफ रहा हूं. एक डर मेरे भीतर बैठा हुआ है. अभी भी जैसे डर के भीतर धंसता जा रहा हूं. कमरे में अंधेरा है. मैं बालकनी में आता हूं. आधे से थोड़ा अधिक बड़ा मटमैला चांद बालकनी के आगे टंगा हुआ दिखता है. उसकी मद्धिम-सी रोशनी जैसे छितरा गई है. सामने पहाड़ी की चोटी पर एक लाइट टिमटिमा रही है. सालाना उर्स मेले के लिए मस्जिद के ऊपर एक वेपर लाइट लगाई गई थी, लेकिन दूर से वह एक पिद्दी सफेद एलईडी बल्ब की तरह दिख रही है. सामने लाॅन में रातरानी की सुगंध बिखरी है. बालकनी की रेलिंग से सटकर कुछ देर तक झुका रहता हूं. जैसे मतरसुन्न हो गया हूं. कहां हूं, मुझे कुछ पता न हो. फिर सांस भरता हूं. हवा को सूंघता हूं. हवा का भारीपन मेरी सांसों में चढ़ आता है. कमरे में लौटता हूं. सन्नाटे में दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई पड़ रही है. मेरी धड़कन भी लगभग उसी गति से चल रही है.
स्लीपिंग पिल्स? भीतर से आवाज आती है. ‘नो.’
सुबह फोन करके डाॅक्टर के पास जाता हूं. डाॅक्टर का पूछना ऊब पैदा कर रहा है. वह आज मेरी कुंडली खंगाल के ही मानेगा!
‘इट्स नाॅट सो सीरियस. बट इफ यू डोंट टेक प्राॅपर केयर, इट मे अफेक्ट योर मैंटल हेल्थ.’
‘आप तो मुझे डरा रहे हैं डाॅक्टर साहब!’
‘डरा नहीं रहा. सिर्फ चेतावनी दे रहा हूं. मैं आपसे कुछ सवाल पूछूंगा. प्लीज जवाब दीजिएगा.’
‘ओके.’
‘क्या आप अपने जाॅब से सेटिस- फाइड हैं?’
‘नौकरी है और क्या! जीने के लिए जरूरी है, बस इतना ही.’
‘मतलब आप नौकरी से खुश नहीं हो’.
‘मान सकते हो. बट मुझे कोई परेशानी नहीं.’
‘आपकी निजी लाइफ की कोई उधेड़बुन, जो आप बताना चाहें.’
‘परेशानी थी. एक समय. अब नहीं है. वाइफ से डाइवोर्स हो चुका है.’
‘ओ, आय एम साॅरी.’
‘अरे डाॅक्टर साहब, जब मुझे ही इसके लिए मलाल नहीं है, तो फिर आप क्यों साॅरी कह रहे हैं!’
‘ऐसा कुछ जो आपको परेशान कर रहा हो?’
‘नहीं! ऐसा तो कुछ नहीं.’
‘दिस इज अ टाइप ऑफ एग्जाइटी. आप जो करते रहते हैं उसे सही नहीं मानते. इसलिए वही सपने में आ जाता है.’
‘अरे नहीं डाॅक्टर! मैं वही सब नहीं करता हूं, जो दिखता है. मैं पहाड़ नहीं उठाता. मैं हत्या नहीं करता. मैं कमोबेश भ्रष्ट भी नहीं हूं.’
‘कुछ और याद करिए.’
‘कुछ याद नहीं.’
‘अच्छा. डाइवोर्स के कितने दिन हुए?’
‘दो साल.’
‘तब से आपने अपने वाइफ को देखा है या काॅन्टेक्ट किया है?’
‘नो.’
‘आपकी कोई रिलेशनशिप?’
‘क्या डाॅक्टर?’
‘अन्यथा न लें. सच जानने से आपकी मदद कर पाऊंगा.’
‘रिलेशनशिप तो नहीं है. इच्छा हुई तो एक-दो बार कोशिश की थी. गया था वैसे इलाके में. पर संस्कार आड़े आ गए.’
‘इट्स ओके. नो मोर क्वेश्चंस टुडे.’
शायद मुझे ज्यादा परेशान देखकर डाॅक्टर ने यह प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम खत्म कर दिया.
अपनी बालकनी में आरामकुर्सी पर अधलेटे तरह-तरह के ख्याल आ रहे हैं. सोचता हूं, मैं कब आया था इन पहाड़ियों में? हां, पिछले साल इस शहर की बगल में ही चेक पोस्ट से ट्रेनिंग के दौरान चिल करने के ख्याल से सारे दिन इन पहाड़ियों में भटकता रहा था. मेरे साथ बाइक पर थे मेरे साथी ऑफिसर और बैचमेट उमापित नारायण. दुबले-पतले, लंबे. खूब लंबे बाल. सजने संवरने में खूब टाइम लेते. हेयर ड्रायर से बाल सुखाते. प्यारे आदमी! जिसे कोई लड़की देखते ही प्यार करने लगेगी. जहां कहो वहां चलने को आतुर. पहाड़ घूमना है. डैम चलना. डैम के बगल-बगल तक बीहड़ जंगली इलाका है. पहले कभी नक्सलियों का इलाका था. पहाड़ी से निकलती नदी देखनी है. दूर तक पहाड़ियों के किनारे बसे हुए गांवों को देखना है. रोहू मछली मंगवानी है. पांडेय तो है ही, बना देगा.
ओह! सब कुछ कितना साफ था. इतना पारदर्शी जैसे पहाड़ी नदी का पानी.
पानी को देखते-देखते मेरी आंखें झपक गई हैं. नींद. लाल-लाल सब कुछ.
‘भाई! यहीं मारा गया था डी.एफ.ओ. संजय सिंह और उस एक आदिवासी लड़के को. मैं यहीं था. मैंने ही बुलाया था उन्हें’.
‘ओह! बकवास बंद करो.’
‘सच कह रहा हूं. मेरी नाक बड़ी थी और काफी लाल भी.’
‘आओ देखते हैं, यहीं बगल की झाड़ियों में अभी भी खून के निशान होंगे.’
‘अब चुप हो जाओ भाई! झरने की आवाज सुनो.’
दो दिन रेस्ट के बाद ऑफिस गया तो सीनियर रस्तोगी सर ने डांटा.
‘आजकल के डाॅक्टर को छींक के बारे में पूछिएगा तो उसे सीरियस डिजीज बताकर दवा दे देगा. जिस भी डाॅक्टर के पास जाइएगा, उतना उ कुछ न कुछ रोग बता देगा. मैं आपको एक उपाय बताऊंगा ऐसी नींद आएगी कि रात में मूतने के लिए भी नहीं उठिएगा.’
‘अजीब-अजीब चीजें देखता हूं सर. डाॅक्टर को दिखाकर आया हूं. तब भी कोई अंतर नहीं आया है.’
वे हंसे थे, ‘भे महाराज! आप भी ना. चिल करिए. बहुत टेंशन ले रहे हैं का? आप जैसा बता रहे हैं, लगता है कुछ ज्यादा ही मौलिक सपना देख रहे हैं. आदमी का बात होता तो कोई बात था. आप तो समूचे शहर को ही आदमी बनाकर सपना में ले आ रहे हैं. पहाड़ को उठा ले रहे हैं. उसको तोड़ दे रहे हैं. किसी को मार रहे हैं. जला रहे हैं. टैक्स आॅफिसर से डी.एस.पी. बन जा रहे हैं. कभी जोकर के वेश में फाॅरेस्ट गार्ड बन जा रहे हैं. सपना को इतना छूट मत दिया कीजिए कि कपार पे बैठ जाए. बूझे कि नहीं! कोई क्राइम-थ्रिलर तो नहीं लिखने लगे हैं? रुकिए आजे उपाय करते हैं.’
‘सर, जैसा आप सोच रहे हैं वैसा कुछ नहीं है.’
चैंबर के बाहर वे चंद्रहास को देखकर चिल्लाए, ‘ऐ पांडेय! जरा सुनो इधर.’
चंद्रहास पांडेय ‘सर! सर!’ करता हुआ हाजिर हो गया.
‘ऐ! इधर आओ.’
‘जी सर.’
‘अपना कान नजदीक लाओ.’
चंद्रहास पांडेय उनके नजदीक आ गया. वे फुसफसाते हुए बोले, ‘सुनो! आज दो बोतल लेकर साहब के यहां पहुंचो.गो.’
पांडेय बाहर जाते-जाते बोला, ‘ओके सर.’
‘आते हैं, आपके ही यहां. हमारी पत्नी बड़ी खूसट है. वो चिक-चिक बहुत करेगी’.फिर जैसे अचानक ध्यान आया तो चिल्ला के बोले,
‘पांडेय दो किलो मछली भी ले लेना, ताजा देख के. कतला लेना.’
‘जी सर आते हैं.’ पांडेय निकल गया.
‘चलिए आज मस्ती हो जाए. आप यही सब जो नहीं करते हैं ना इसलिए इ सब होता है आपके साथ. एक बात सुनिए मिश्रा जी, आप जिस कोलोनी में रहते हैं ना वहां इंजीनियर और ठेकेदार से लेकर ऐडवोकेट-उडभोकेट सब रहता है. बोलिए रहता है कि नहीं?’
‘हां सर! रहता तो है.’
‘सबका आलिशान घर देखे हैं ना. सब का आंत तगड़ा है. पचा गया है सब. झाड़ा भी नहीं फिरता है. सुबह-सुबह टहलता है सब. चेहरा देखिएगा. बाप रे बाप! कोई के टेंशन नहीं है. और आप हैं कि...’
मैं चुप हो गया. उनके लिए चाय मंगवाई. चाय पीकर वे गए तो मेरा मन फिर अशांत हो गया और कई बातें आने लगीं. ‘क्यों एक शहर जो हमारी कल्पनाओं में रहता है सामने से बिल्कुल वैसा नहीं होता? हम भी सामने से बिल्कुल वैसे नहीं होते. क्या इसलिए कि हमारे भीतर कई घाव होते हैं, जिनसे मवाद निकल रही होती है?’
मुझे यह सब नहीं सोचना चाहिए. मुझे अपना दिमाग दूसरी चीजों में लगाना चाहिए. लेकिन फिर मुझे यह बार-बार अंदेशा होने लगा कि कहीं मैं बिल्कुल दूसरा आदमी होता जा रहा हूं? क्या बेहद स्वार्थी, काइयां और क्रूर!
दिन ढलते ही ऑफिस से घर जाते एक निचाट अकेलापन सामने पसर जाता है. हर दिन की रुटीन लाइफ की तरह मैं यहां से निकलूंगा. ऑफिस की गाड़ी पूरे शहर को क्राॅस करते हुए मुझे घर पहुंचा देगी. इंचार्ज सिन्हा सर उसी तरफ रहते हैं. वो कहेंगे चलिए चाय पी लीजिएगा. मैं कहूंगा आज रहने देते हैं सर, मूड नहीं है. फिर वो कहेंगे कल शाम में आइएगा. सब लोग आएंगे. मटन पार्टी है. मैं समझ जाऊंगा. सब लोग आएंगे का मतलब हुआ कि ट्रांसपोर्टरों ने मंथली इनस्टाॅलमेंट पहुंचा दी है. सब हिसाब कल ही होगा.
शाम को मेड आएगी. वह देर शाम नहीं आती है. थोड़ा पहले ही आ जाती है. वह शादीशुदा है. एक छोटी बच्ची की मां है. सुंदर है. अच्छे कपड़े पहनकर आती है. उसको देखकर एक बार ऐडवोकेट मनोज कुमार सिंह ने चुटकी ली थी. ‘सर को तो एक साथ कई लाभ मिल गया है.’ ‘क्या सिंह जी कुछ भी बोल देते हैं.’ ‘नहीं सर! पता किए हैं. किरण इस यंग ऐज में विधवा हो गई है.’ ‘हां तो! इससे आपका क्या मतलब है?’ ‘अरे नहीं कुछ सर. बस ऐसे ही बता दिए.’ मेड मुझे भैया कहकर पुकारती है. मैंने कभी उससे उसके घर के बारे में नहीं पूछा. कुछ दिन पहले जब मैंने पुरानी मिक्सी की जगह नई मिक्सी मंगाई तो उसने बस इतना कहा कि, ‘भैया ये मिक्सी मुझे दे दीजिएगा? मेरे महीने से काट लीजिएगा’.‘अरे ले जाओ! महीने से क्या काटना.’
आज जब बेड पर गया तो सोनल की याद आई. मैं तटस्थ होकर सोचता हूं. यह जानते हुए कि तटस्थ नहीं हुआ जा सकता. ‘तुम क्यों आई थी सोनल मेरे जीवन में! देखो तो तुमने सब कुछ गड्डमड्ड कर दिया’.‘मैं आई थी? तुम आए थे. अपने झोलटंग पिता के साथ. कुत्ते की तरह दुम हिलाते हुए.’ उसकी यह बात याद करते हुए भी जैसे मन अजीब हुआ जा रहा है. ‘ठीक ही कहती हो मेरे परिवार की महत्वाकांक्षा और गरीबी तुम्हारे रसूखदार पिता के पास ले गई थी. हम नहीं जान सके कि शादी बराबरी वालों के साथ ही करनी चाहिए’.
‘तुमने कभी मेरी परवाह नहीं की. कभी मेरी इच्छाएं नहीं जानीं. तुम्हें ईमानदार होने का चस्का लगा है ना. लेकिन बता दूं तुम ईमानदार हो नहीं, ढोंगी हो. पिशाच हो तुम!’
‘मैं?’
‘और नहीं तो कौन?’
मैं इस बारे में कुछ भी याद नहीं करना चाहता, पर स्मृतियां मुझे उसी ओर लिए जा रही हैं. शादी की चर्चा महीनों तक होती रही थी. मेरे गांव-घर के लोगों ने इतना तामझाम किसी भी शादी में नहीं देखा था. सारे बारातियों को कपड़े के साथ एक-एक चांदी का सिक्का भी दिया गया था. सारे ऑफिसर बैचमेट्स आए थे और लगा जैसे सिनेमा की शूटिंग हो रही हो.
हम दोनों के बीच कभी प्यार जैसी चीज नहीं हुई. शादी के एक सप्ताह के भीतर ही सब कुछ शुरू हो गया. शायद मैं ही बहुत क्रूर था सोनल! शायद मैं शादी के लिए बना ही नहीं था. तुमने भी कोई सार्थक कोशिश नहीं की. आग में केरोसिन डालती गई तुम. तुम्हारा बार-बार ताना देना. अपमानित करना, मां-पिता के साथ मेरे घर के हर सदस्य को. आत्महत्या की धमकी देना और हर वक्त कोसना सहन नहीं हो पाया. तुम मुझे बिल्कुल नहीं समझ पाई. या कहूं कि मैं भी तुम्हें बिल्कुल नहीं समझ पाया. मेरे भीतर का पुरुष आपा खो बैठा. मेरे थप्पड़ के बदले तुमने भी अपनी सेंडिल चला दी थी.
‘तुम एक नकारा आदमी हो साकेत! कोई तहजीब नाम की चीज नहीं है तुम्हारे भीतर. देहाती भुच्चड़ हो तुम. शिट्. मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती.’ ऐसी लाइनों से तुम्हें नहीं पता कि मैं भीतर से कितना चिढ़ता था. जीवन भर ऐसी चीजों को झेलते रहने से बेहतर था कि कोर्ट-कचहरी के बाद हम अलग हो गए.
नींद आते ही कई कटी-फटी आकृतियों का कोलाज शुरू हो गया. रेड जोन के बीच एक लाल नाक वाला जोकर और एक भूतनी नाच रहे हैं. ठहाका लगा रहे हैं.
रात अचानक नींद खुलती है और जैसे धड़कन तेज हो गई है. चारों ओर अजीब सन्नाटा है. रेल की धड़धड़ती आवाज दूर तक तैरती गई है. आज चांद नहीं है. कहीं नहीं है चांद. न हो तो बढ़िया है!
मेरे भीतर कुछ कौंधा. कुछ चीजें दिखानी होती हैं. जैसे तेवर, जैसे जलवा, जैसे भावनाएं, जैसे मित्राता, जैसे चेहरा. ‘लाइफ इज मीनिंगलेस.’ ‘मेक इट वेरी मीनिंगफुल’ ‘कैसे?’ ‘बिना दिखाए और अपना चेहरा चमकाए तुम्हारे साथ कुछ अच्छा नहीं हो सकता. खुद को नरम दिल साबित करने के लिए कुछ करो!’ ‘क्या करूं?’ ‘अरे चेहरा चमकाओ. इमेज बिल्डिंग इज एन आर्ट. ऑफिस की साफ-सफाई करवाओ. गार्डेन बनवाओ और उसमें पौधे रोपो, फूल लगाओ. लोग तुम्हें अच्छा आदमी मानने लगेंगे.’ ‘हां?’ ‘सच कह रहा हूं.’ ‘ये आइडिया तो अच्छा है.’
अगले ही दिन मैंने ऑफिस में फूल लगाने का ‘महोत्सव’ प्रारंभ किया. मन में कुछ कुलबुलाया. ‘ये मदनोत्सव तो नहीं’! ‘अरे यार!’ ‘हंसने के लिए कह रहा हूं.’ ‘हां तुम चाहते हो तो मैं हंस ले रहा हूं. ही...ही...ही...देखो!’
इंचार्ज एंड ज्वाइंट कमिश्नर भैरवनाथ सिन्हा उर्फ बी.जे. सिन्हा सर खुश दिखे. ‘अरे इ तो दिल की बात कर दिए मिश्रा जी! मेरे लिए सेवा हो तो बतलाइए. फीता कटवाइएगा ना. एडमिन को बुला लें का? वो भी खुश हो जाएंगे.’
‘उनका चक्कर छोड़िए सर. आप हैं ना. किसी साधारण आदमी को पकड़ते हैं. आपका मन करे तो मीडिया को मैनेज कर लीजिए.’
‘हां, मीडिया वाला तो आइए जाएगा’.
दो बुर्जुगों को उठाया गया. आॅफिस के आगे ठेला लगाने वाला बूढ़ा. अजीब दृष्टि से सब कुछ देख रहा था. उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसके कंधे पर शाॅल रखी जा रही थी. वह तो आॅफिस घुसने की हिम्मत भी नहीं करता था. सिर्फ गाड़ियों को बाहर निकलते हुए देखता था. दूसरे, एक सीधे-सरल बुजुर्ग इज्जतदार वकील साहब जो यदा-कदा ऑफिस आते थे, को सम्मानित किया गया. फूल लगाते हुए उनकी तस्वीर ली गई. लोकल अर्श चैनल ने खूब न्यूज चलाई.
इस घटना के बाद मैं ऑफिस से निकलकर थोड़ी दूर पैदल चलकर जब-तब उस जगह पहुंच जाया करता. जहां बाहर दीवारों के किनारे फूल-वाले रंग-बिरंगे फूलों के पौधे बेचा करते. उन पौधों को खरीदकर मैं आॅफिस के गार्डन में रोप देता. लोग कहते ‘जहां ऑफिस की दरो-दीवार पर पान और गुटखे की पीक चिपकी हो वहां आप उसे फूलों की रंगत से सजाने क्यों चले हैं?’ मैं बस दांत निपोर देता.
और ऐसे ही इसी शहर में एक बार फूलों के पौधे खरीदते हुए मुझे वो शख्स मिल गया था. वैसे तो फूल के पौधे और बीज मैंने कई जगह से खरीदे थे. ऐमेजोन और फ्लिप कार्ट पर फूलों के बीज के कोम्बो पैकेट भी उठाए. ढेर सारे वादे के साथ! जैसे मिट्टी में डालो कि धड़धड़ा के फूलों के स्वस्थ पौधे निकल आएंगे. पर उन बीजों से कुछ ने सिर उठाया बाकी मिट्टी में सुपुर्दे-खाक हो गए.
‘आप भाग्यशाली हैं मिश्रा जी! अरे आपने तो इस शहर को आबाद कर दिया! जो हम लोग नहीं कर पाए आपने कर दिखाया. आप तो फेमस हो ही गए हैं.’
‘शहर को कहां आबाद किया है सर! और आपको क्या लगता है कि किसी एक के फूल लगा देने से शहर आबाद हो जाएगा?’
‘अरे महराज! शहर तो ऑफिसे से न बनता है. देखिएगा आपको जरूर पुरस्कार मिलेगा. इसी महीने जिला स्थापना दिवस का महोत्सव होने वाला है. डी.एम. साहब तक इ खबर चला गया है. आपको साफ-सफाई कमिटी में भी डाला जाएगा. अरे महाराज, आप तो स्टार हो गए हैं अब’.
तब मैंने जाना कि कुछ सीनियर अफसरों का जन्म ही ईष्र्या और जलन के लिए होता है.
आॅफिस में तो खैर क्या कुछ बदलता! मेरी छवि अलग हो गई. लोग कहते, ‘अरे वही फूल वाले साहब! जो, जो मासूम से दिखते हैं!’ ‘मासूम!. ह...ह...हा.’
कुछ दिनों तक उत्साह के कारण मेरे खाली समय में मेरा मन खाली नहीं होता बल्कि कल्पना करता रहता है कि अमुक जगह पर अगर अमुक फूल होता तो क्या होता! क्यारियां हर तरह के फूलों से सजी होनी चाहिए और ऐसी कल्पना मन में आते ही उस फूल के पौधे ढूंढ़ने मैं चल निकलता हूं.
इस आॅफिस में मैंने क्यारियां सजाईं, ईंट मंगाए. ईंट भट्ठे वालों को डांट पिलाइर्, ‘कंपाउंड टैक्स चूज करने से क्या होता है? कुछ सेवा कीजिए. आपके जिम्मे दो ट्रैक्टर ईंट.’ भट्ठे वाला खुशी-खुशी गया. ‘हुजूर की सेवा का मौका मिला है. मैं तो धन्य हो गया.’ गमले वाले के यहां से गमले उठवाए. बेचारा खुद को गरीब साबित करने में लगा था. आॅफिस के ड्राइवर ने धमकाया तो वह लाइन पर आ गया. उसने पचास गमले फ्री में दिए और दो सौ गमलों को लागत मूल्य पर दे दिया. और जब फूल खिले तो सबने कहा, ‘वाह, साकेत साहब वाह!’
उस दिन हुआ यूं कि वह शख्स फूल बेच नहीं रहा था. वहीं खड़ा था. कलेक्ट्रियेट के पास. मेरा ध्यान फूलों पर था परंतु उसका मुझ पर. अपनी ड्यूटी में सबको शक-शुबहे की निगाह से देखने के कारण मेरा एक त्रिनेत्रा भी आखिरकार खुल ही गया था कि मैंने उसी आंख से पौधा खरीदते मुझे घूरते उस आदमी को देखा. मैं असहज होने लगा. क्यों कोई आदमी मुझे इस तरह घूर रहा है! मैंने अपने सीनियर अफसरों से निगरानी ट्रैप या उससे पहले की जाने वाली रेकी के किस्से सुन रखे थे. मैं चैकन्ना हो गया. कौन जाने कोई कहे कि यह साहब फूल लगाने के पैसे कहां से लाता है?
‘‘क्या तुम वही हो जो मैं समझ रहा हूं?’’
मैं थोड़ा सहज हुआ, ‘‘ये मैं कैसे समझूं कि तुम मुझे क्या समझ रहे हो?’’
‘‘तुम्हारी नाक अभी भी लाल है. इससे मैंने तुम्हें पहचान लिया. लेकिन तुम मेरे शहर में क्या कर रहे हो?’’
‘‘ये तुम्हारा शहर है? और तुम मेरी नाक के इतिहास के बारे में क्या जानते हो?’’
‘‘तुम्हारी नाक के बारे में तुमसे ज्यादा जानता हूं. रोसैसिया है यह. एक लाइलाज बीमारी. और सुनो! यह मेरा ही शहर है बरखुरदार!’’ उसने मेरी ओर बाहें फैलाई. मैं अब उसकी बांहों में था. उसकी शर्ट पर कनोजिया अतर की खुशबू थी. मैं अब महकने लगा था. वह मुझे दूर बहुत दूर दिखते समय की धुंध में ले गया.
तो यह है उसका शहर. राज्य के बाॅर्डर लाइन पर एक जिले का मुख्यालय था. इसमें प्रवेश करने के पहले कुछ कटी-फटी बेडौल पहाड़ियां दिखती थीं. इसमें एक सामान्य शहर जैसा सब कुछ था. आॅफिस, पार्क, फ्लाईओवर, बगल से गुजरने वाला हाईवे, आर.ओ.बी., कुछ नए बनते माॅल, व्यावसायियों और ठेकेदारों की बढ़ती आमद और एक पोस्ट आफिस.
कभी मैंने उससे कहा था, ‘मुझे पोस्ट आॅफिस से मुहब्बत है. मैं अक्सर हरे, लाल और पीले लेटर बाक्स को निहारता रहता हूं.’ लेकिन हकीकत जानता हूं कि इस शहर के डाकघर सहित तमाम डाकघर सरकारी चिट्ठियों के भरोसे चल रहे हैं.
एक बड़ा-सा अस्पताल और उसी के साथ एक मेडिकल काॅलेज. जो उस क्षेत्रा के एक बड़े एम.पी. का था, जिसके बारे में आम लोगों की यह धारणा थी कि हर साल इस इलाके की कुछ पहाड़ियां उसके पेट में चली जाती हैं और उसकी पाचन शक्ति का कारनामा देखिए कि वे डकार तक नहीं लेते हैं.
एक वन विभाग था. जो बचे हुए पहाड़ों पर पेड़ लगाने का दावा करके शेखी बघारने और अपने साइट पर खूब सुंदर-सुंदर फोटो लगाने के लिए कुख्यात था. कभी उसका अधिकारी एक ईमानदार आॅफिसर था पर अभी का अधिकारी परले दरजे का हरामखोर कवि था जिसने सभी पेड़ों पर सुंदर-सुंदर स्लोगन्स लगा रखे थे. उसे इसका गुमान था कि शायद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने उसे पुरस्कार न देकर अपने ही स्तर को छोटा कर लिया है.
एक कोयला मंडी थी इस शहर के एक उपशहर में जिसके बारे में विख्यात था कि कभी पूरे राज्य के भ्रष्ट अधिकारी यहीं बसना चाहते थे क्योंकि यहां का पानी सबसे मीठा था.
‘इतनी देर तक हम गले मिलते रहेंगे तो हमें कोई कुछ और समझ लेगा.’ मैंने उससे यह कहते हुए खुद को अलग किया. मेरे इर्द-गिर्द खुशबू का घेरा अब भी बरकरार था. मैं भी अब सहज हो गया था. ‘मेरे शहर में क्या कर रहे हो दोस्त!’ ‘मुझे नहीं पता था कि यह तुम्हारा शहर है.’ यह कहते हुए हम वापस चलने लगे. बस यहीं बगल में आॅफिस है. चलो!
आॅफिस में मैंने सारे लोगों से उसे मिलवाया. वह सबसे मिला, पर वह असहज था. उसने बस इतना कहा ‘अब अगली मुलाकात मेरे घर पर होगी. यहीं पास ही करीमनगर मोहल्ले में रहता हूं.’ इस मोहल्ले के नाम से मैं चैंक गया. दो साल पहले यहीं लाॅ एंड आॅर्डर संभालने मैं गया था. होली के अवसर पर कितना उपद्रव हुआ था वहां.
‘तुमको कितना कुछ सुनाना है दोस्त! लंबी कहानी है. अब्बू को तो...वे अब नहीं रहे. अम्मी के साथ रहता हूं.’ उसके चेहरे पर उदासी साफ दिख रही थी. मैं उसे छोड़ने नीचे उतरा. आॅफिस का अहाता और भी बड़ा होता अगर बीच में एक मंदिर न होता. मंदिर के पुजारी ने कभी उस मंदिर की कहानी वीरोचित उत्साह से सुनाई थी कि कैसे एक मजार को उखाड़ के यह मंदिर बनाया गया था. मैं यहां आते ही चैंका था कि आॅफिस के अहाते में मंदिर! शायद शकील भी नीचे उतरते यही सोच रहा था. लेकिन उसने यह नहीं कहा. उसने बाकी जगहों में बनी क्यारियों में लगे फूल और गमलों को देखकर कहा. ‘वाह दोस्त! तुमने इस बंजर जगह को भी जन्नत बना दिया है.’ ‘दोस्त तुम आए लेकिन इतनी छोटी मुलाकात में जी नहीं भरा. मिलते हैं फिर इत्मीनान से’.
कोई भी आॅफिस आपको इत्मीनान से रहने नहीं देता. यहां भी ज्वाइनिंग करने से पहले ही मेरी इमेज पहुंच गई थी. इंचार्ज ने सारे एडवोकेट्स एंड सी.ए. के साथ मीटिंग रखी और उनसे मेरा परिचय कराया. ‘तो आप हैं मिस्टर साकेत कुमार मिश्रा. यहां आज ही ज्वाइन किया है.’ सीनियर एडवोकेट जी.के. पोद्दार तपाक से बोल पड़े ‘अरे मैं तो इस साहब को पहले से जानता हूं. ये लेखक हैं और लेखन का शौक पालते हैं.’ ज्वाइंट कमिश्नर सिन्हा सर ने छूटते ही कहा, ‘अजी लेखक तो लेखन का ही शौक पालेंगे ना.’ एक जोरदार ठहाका गूंज पड़ा.
मैं पूरी मीटिंग में उसे घूरता रहा. अजीब हैं लोग! कितनी खबर रखते हैं. तब तो इनके पास मेरी निजी जिंदगी से संबंधित हर खबर होगी? उफ! इन्हें और कोई काम नहीं है क्या कि दिन भर ये खबर ही बटोरते रहते हैं. मेरे साथी आॅफिसर तक इक्का-दुक्का ही मेरे हाॅबी या शौक के बारे में जानते हैं. मैं थोड़ा असहज हो गया था. एडवोकेट जी.के. पोद्दार ने मेरी असहजता समझ ली.
‘मिश्रा साहब खूब घूमना भी पसंद करते हैं. ऐतिहासिक जगहें इन्हें पसंद हैं. साहब आप कभी कहिएगा. हम आपको घुमाएंगें. बहुत अच्छी जगह पोस्टिंग हुई है आपकी. आपको अपने मिजाज के लोग मिलेंगे यहां.’ मैंने चेहरे पर दिखावटी मुस्कान बिखेरी. ‘जरूर.’
अपने चैंबर में आया तो देखा टेबुल पर एक फाइल पड़ी है. बैठा ही था कि प्यून ने खबर दी, डिप्टी कमिश्नर आर.एन. सहनी सर अपने चैंबर में आपको याद कर रहे हैं. ये फाइल भी मांग रहे हैं. उसने फाइल भी उठा ली. सहनी सर के चैंबर में प्रवेश करते ही मैंने उनको नमस्ते किया. उन्होंने उठकर तपाक से हाथ मिलाया. ‘अरे बैठिए साकेत जी! इस आॅफिस में आपका स्वागत है.’ मुझे पहली बार उनके द्वारा पुकारा गया यह नाम अच्छा लगा. उन्होंने चाय का आॅर्डर दिया.
‘जांच कमिटि में आपका भी नाम है. चलेंगे एक-दो दिन में. फाइल देख ली है ना? एक बार अच्छे से अध्ययन कर लीजिएगा. ’
मैंने उनके आगे फाइल बढ़ा दी.
हमें पर्यावरण के संरक्षण का दायित्व भी अपने सर उठाना था. उठाना क्या था नाटक करना था. चिट्ठी कमिश्नर की थी. पी.एम.ओ. कार्यालय से आई है चिट्ठी.
‘सर? पर्यावरण के मामले में हमारा क्या काम?’
‘अरे, टैक्स का मामला भी तो जुड़ा हो सकता है साकेत जी.’
‘सर!’
एक आदमी पिछले 10 सालों से पी.एम.ओ. में चिट्ठी लिखता रहा है. उपशहर के कोयला मंडी के इर्द-गिर्द बड़े पैमाने पर कच्चे कोयले को पकाकर अवैध तरीके से लोग पक्का कोयला बना रहे हैं और पूरे इलाके के लोग धुएं के कारण घातक बीमारी से ग्रसित हो रहे हैं. पेड़-पौधे और फसलें भी प्रभावित हो रही हैं.
‘दस साल कम नहीं होते सर. इन दस सालों में क्या कार्रवाई हुई?’
‘कार्रवाई?’ वे हंसे.
‘अरे समाहरणालय के अधिकारी चिट्ठियों को टरकाने में पारंगत हो चुके हैं इसलिए उन्होंने इसे भी हमेशा की तरह इस बार भी टरकाया है. लेकिन हमें तो जांच रिपोर्ट देनी होगी.’
‘सर इसमें चैबीस चिट्ठियां हैं और आखिरी चिट्ठी एक साल पहले की ही है. क्या यह आदमी भी थक गया?’
सहनी सर ने वन विभाग के एक डी.एफ.ओ. की हत्या का प्रसंग सुनाया. जिसे उसे भी चंद्रहास पांडेय ने सुनाया था. चंद्रहास पांडेय एक स्थानीय लड़का था. खूब खुशमिजाज. थोड़ा मोटा लेकिन फुर्तीला.
‘साकेत जी डी.एफ.ओ. साहब को भी ऐसे ही किसी अदृश्य व्यक्ति की चिट्ठियां अक्सर मिलती रहती थीं.’
क्या कोई वैसी ही चिट्ठी है ये? पता नहीं. आखिरी चिट्ठी को वह देखने लगा.
आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
नमस्ते!
महोदय, कहते हुए बुरा लग रहा है पर यह हकीकत है. सरकारी तंत्रा की नाक के सामने ‘दोपाए दीमक’ हमारे राज्य की, जिले की लगभग सारी खूबसूरत पहाड़ियां चट कर रहे हैं. पहले ही अवैध खनन का कारोबार दिन के उजाले में हो रहा है. इमारती लकड़ियों के लिए पहाड़ियों के जंगलों के एक से बढ़कर एक वृक्षों को बेरहमी से काटा जा रहा है. यही नहीं कोयले के अवैध कारोबार के कारण यहां लोगों का जीना मुश्किल हो गया है. आने वाले समय में पूरा इलाका फेफडे़ की गंभीर बीमारियों से ग्रसित होगा.
त्वरित कार्रवाई की उम्मीद में.
भवदीय
शैलेश यादव
चंदन पहाड़ी
‘चंदन पहाड़ी कहां है सर?’
‘अरे जहां आपके रहने की व्यवस्था की गई है ना, वहीं सामने से पहाड़ी शृंखला शुरू हो जाती है.’
अब इस प्रसंग के महीनों बीत गए हैं.
रोज की तरह आॅफिस से वापस आकर हाथ-मुंह धोकर मैं अपने बिछावन पर लेट गया हूं. छत की ओर निहारता हुआ मैं... मेड चूड़ा फ्राई कर चाय के साथ टेबुल पर रख गई है. मैं कहीं खो रहा हूं...मैं फिर से यादों की दुनिया में प्रवेश करता हूं. एक साइकिल हुआ करती थी जिसको कभी चलाते समय हवा शर्ट के खुले बटन होकर छाती तक पहुंचती थी. कोई शायर या कवि होता तो कहता ‘हवा में छाती के बाल ऐसे लहरा रहे हैं जैसे मूंज की घास’.साइकिल के पीछे के कैरियर पर एक आशिक बैठा पूछता हैµउसके घर की दरो-दीवार पर ढूंढ़ने को कुछ भी नहीं गालिब फिर मैं बार-बार पता क्यों ढूंढ़ता हूं.
‘‘अबे यार! एक बात बता.’’
‘‘हूं.’’
‘‘प्रोफेसर डी.के. सिंह की मूछें तुम्हें कैसी लगती हैं?’’
‘‘मूंछों के बाल चबाता है वो आदमी. आंखें ऐसे घूरती हैं कि लगता है कच्चा खा जाएगा. अपने स्टूडेंट्स की हर गतिविधि पर नजर रखता है. सूचनाएं जुटाता है. ही इज अ क्लासिकल फासिस्ट.’’
‘‘मिश्रा, इंटरव्यू ऐसा क्यों दिया? क्या तुम वाकई गुलाम अली को नहीं जानते थे?’’
‘‘शकील मियां, तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते हो? चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डाला, मेरा फेवरेट है. वाहियात सवाल था. और मैं जानता था, ही हेट्स मुस्लिम आर्टिस्ट.’
‘हैव यू सीन एनी फिल्म रिसेंटली?’
‘‘यस सर! ‘गुलाम’.’’
‘हू इज द हीरो?’
‘आमिर’
‘डू यू नो एनी अदर गुलाम?’ ‘हां सर! इतने सारे हैं. वो तो हम सभी हैं. रिमेंबर एनिमल फार्म सर? और सुअरों की वह जमात जो सत्ता पर कब्जा कर बैठ गई थी’.
‘‘हा...हा...हा...ऐसा कहा तुमने मिश्रा?’’
कहां था शकील इतने दिनों. या कहूं कि कहां था मैं? उसने कैसे मेरी नाक से मुझे पहचान लिया जबकि मैं उसे क्यों नहीं पहचान पाया. क्या मैं अपने को भी नहीं पहचान पा रहा हूं? क्या हो रहा है मुझे?
पहली बार जब ट्रेनिंग में आया तो लगता था कि इतने एटिकेट्स और फाॅर्मल बिहेवियर के साथ तो मैं घुटकर मर जाऊंगा. नाम बड़े और काम छोटे. खूब बड़ी-बड़ी बातें. बहुत उबाऊ! खुर्राट लोगों के चेहरे पर इतना तेज कैसे आ जाता है? कभी नहीं सोचते हैं ये. इनका खून नहीं जलता ना!
मिश्रा लोग झा लोगों की प्रशंसा कर रहे हैं.
‘ऐ झा जी!’
‘हां जी!’
‘अरे, उ किस्सा सुनाइए ना कि कैसे आप स्काॅर्पियो पर ऊंघते-ऊंघते यह जान लेते थे कि ट्रकवा में क्या माल लदा है.’
‘अरे, इसी को न एक्सपेरियंस कहते हैं मिश्रा जी!’
मैं हतप्रभ था. ऐसे खुर्राट लोगों को देखकर. लोग कितनी खबर रखते हैं. लोगों का सूचनातंत्र कितना मजबूत है!
मेड आकर टोकती है, ‘खाना क्या बनाऊं भैया?’
‘जो मन में आए बना दो.’
‘अच्छा, पालक-पनीर बना देती हूं. अरे आपकी चाय ठंडी हो गई.’
‘ओह! फिर से गर्म कर दो.’
मेड खाना बनाकर जाते हुए बोल गई है कि भैया दरवाजा बंद कर लीजिए.
दरवाजा बंद कर मैं फिर बिछावन पर आकर लेटता हूं. मेरे हाथ में कोई किताब आती है. फिर किताब हाथ में लिए सोचने लगता हूं. जब मैं गाड़ी से ईंट भट्ठे जाने लगा था तो न जाने एक से एक कितने बीहड़ इलाके देखे. पूरा का पूरा जंगल. पहाड़ी की तलहटी में ही ईंट के भट्ठे थे. जहां तक पूरी पक्की सड़क नहीं थी, वहां जाने में मदद उस ड्राइवर ने की थी. जो लंबा तगड़ा एक युवा था और जो अपेक्षाकृत इस दुनिया के हिसाब से नया था. उसके अंदर चालाकियां नहीं आईं थीं जो अक्सर इस विभाग के सिपाही, होमगार्ड, बाबू, ऑपरेटर और संदेशवाहक प्यून तक में आ जाती है ऐसे माहौल में रहते-रहते.
पहाड़ी के पैरलल लगभग 15-20 किलोमीटर की दूरी तक सैकड़ों ईंट भट्ठे! मालिकों की टैक्सचोरी, कमीनागिरी और मुंशियों की चालाकियों के किस्से भरे पड़े थे यहां. साथ ही ईंट भट्ठे पर काम करने वाली औरतों और गरीब आदिवासियों के शोषण की अंतहीन कहानियां पसरी हुई थीं. धूप में सूखती ईंटों की बनी दीवारों पर गरीबी के सूखते चिथड़ों की तरह न जाने कितने किस्से टंगे पड़े सूख रहे थे.
फरवरी-मार्च का महीना बहुत जालिम महीना होता है. टैक्स के लिए अंधी दौड़ लगानी पड़ती है. जहां से आए, जैसे भी आए, सही गलत बाद में देखेंगे. नहीं हो तो बैंक अकाउंट अटैच कर लो. कुछ तो आएगा? चले जाओ ईंट भट्ठों पर. पहाड़ी के पीछे ईंट भट्ठे हैं.
सी.ए. आलोक बोलता था, ‘आइए ना सर, हम आपको सोन नदी का बचवा मछली खिलाते हैं. एक बार खा लीजिएगा तो कभी नहीं भूल पाइएगा स्वाद.’ ‘अच्छा देखते हैं आलोक जी’ ‘क्या सर? देखना क्या है. आ जाना है. आप इंज्वाय करना नहीं सीखे हैं. सीख लीजिए, इस विभाग में ढेर काम आएगा. अरे सिन्हा जी ने ईंट भट्ठा देके आपको वैसे साइडे कर दिया है, लेकिन आपके काम का है. फूल लगाना चाहते हैं ना आप? काम आएगा ईंटा. बोलिए ना सर कितना ट्रैक्टर चाहिए?’
सिंह जी हमसे जस्ट सीनियर हैं. आ गए हमरे डेरा पर. ‘क्या मिश्रा जी? आप ऐसे रहते हैं महराज? कोई फर्निचर तो हैयिए नै है आपके पास! आएं बताइए तो. विभगवा पर काहे जुलुम करते हैं! नाक कटाइएगा आप इस विभाग का. चलिए कल एडमिन सिन्हा जी से कह के छापा वाले टीम में आपको ले लेते हैं. फर्नीचर वाले के यहां चलना है.’
‘मुझे तो ईंट भट्ठे पर जाना है सर. गाड़ी एलाऊ कर दिए हैं. सिन्हा सर ही.’
‘आप भी न! ईंट झामा में कुछ रखा है महराज? चलिए उधर. एक दिन उधर मत जाइए. हम कहलवा देंगे कि छापामारी में ज्यादा अफसर का जरूरत है.’
दूसरे दिन हम एस.पी. के ऑफिस में बैठे थे. उन्होंने ही बुलवाया था. डिप्टी कमिश्नर ‘राम नारायण सहनी’ सर उनके सामने थे. मुझे भी उन्होंने साथ ले लिया. मुझे देख एस.पी. पहले ही ठिठक गए. ‘ये कौन है?’ ‘सर नया ऑफिसर है, असिस्टेंट कमिश्नर साकेत कुमार मिश्रा’. ‘क्यों जी साकेत ट्रेनिंग में कुछ नहीं सीखा? इतने लंबे बाल?’. ‘सर एस.के.एम. राइटर हैं.’, ‘एस.के.एम.?’ ‘साकेत कुमार मिश्रा’ ‘ओ अच्छा! अरे सहनी! इसे कुछ सिखाओ! और अफसरी में राइटिंग का क्या काम? बच्चे की तरह दिखता है. कौन मानेगा इसका कहना? खैर! सहनी! दो मुद्दों के लिए तुमको बुलवाया है. एक तो क्रशर वाले इश्यू पर. दूसरा कोयला वाला मामला. एक चीज और...सारे अफसर का नाम काहे नहीं भेजा है आपका विभाग? लाॅ एंड ऑर्डर ड्यूटी के लिए! देख नहीं रहे हैं शहर में कितना तनाव बढ़ गया है!’
‘सर...सर...’ ‘एक काम करिए. कोयला मंडी में आने वाले सारे ट्रकों को जब्त कर लीजिए और उन्हें थानों में लगवा दीजिए. मैं सारे थाना प्रभारी को इस संबंधी सूचना भेज देता हूं. अगर कहीं से कोई थाना सहयोग न करे, मुझे तुरंत इत्तला कीजिए. अंडरस्टेंड? नाऊ गो. बी फास्ट.’
हम जब पर्यावरण संरक्षित करने का भार उठाकर उस इलाके में पहुंचे थे तो वहां सिर्फ चार-पांच खाली जगहों पर सुलगते कोयले और उससे उठ रहे धुएं के अलावा कोई नहीं था. कोई बताने को तैयार नहीं था कि यह किसका है. पूरे गांव घूम जाने के बाद भी किसी ने कुछ नहीं बताया. मैंने खेलते हुए बच्चों से पूछताछ की तो सहनी सर ने टोका, ‘साकेत जी! अब चला जाए. एक मिनट भी मत रुकिए.’ ‘क्या हुआ सर?’ बोलते-बोलते उन्होंने मुझे गाड़ी में खींच लिया. हम लोग अब पहाड़ी के पास के रास्ते से गुजरने लगे. जहां अधकटी और गहरी खाइयां थीं. आसपास कुछ क्रशर लगे हुए थे. कुछ कच्ची ईंटों के घर! मानो क्रशर-मजदूरों के हों. दूर-दूर तक सन्नाटा पसरा था. इलाके का सारा काला धुआं मद्धिम होते सूरज को और भी मद्धिम बना रहा था. पहाड़ी के आसपास शाम जल्दी उतर रही थी.
‘आपने ऐसे क्यों खींचा सर?’
‘आपने नहीं देखा. कुछ लोग हल हथियार के साथ जुट रहे थे. ज्यादा देर रुकते तो वो हमला कर देते.’
रविवार के दिन इन पहाड़ों पर घूमने का कार्यक्रम तय हुआ. यहां की पहाड़ियां हरी-भरी हैं. यहां सबसे खूबसूरत बरसाती झरने हैं. दूर से ही हरियाली के बीच चैक से खींची गई लकीर की तरह दिखेंगे ये. इन्हीं पहाड़ियों पर डिस्ट्रिक्ट फाॅरेस्ट ऑफिसर संजय सिंह की लाश पाई गई थी.
ऑपरेटर चंद्रहास पांडेय हमें यह सब उस यात्रा में बता रहा था. ‘सर उस समय का रिपोर्ट था कि नक्सलियों ने उन्हें मारा और खुद उनके पिता को फोन किया कि लाश ले जाइए. साथ में एक और आदिवासी लड़का था. उसके साथ जंगल- जंगल घूमते रहते थे. एक तरह से वो लड़का उनका खबरी था.’
हम लोग सात-आठ की संख्या में हैं जिसमें तीन अफसर और दो प्यून और दो ऑपरेटर पहाड़ी पर एक जगह उन पत्थरों के बीच बैठे हैं. चांदनी रात में इस झरने के आसपास बहुत लोग रात भर यहां रह जाते हैं.
पांडेय मीट बनाकर खिलाने और अफसर लोगों की सेवा के लिए विख्यात था. वह अपने काम में लगा हुआ था. ईंटों से बना चूल्हा और जंगल की सूखी लकड़ी से उसने अपना काम शुरू कर दिया था और बीच-बीच में गप रसाने लगा.
‘यहां कोई खतरा तो नहीं?’
‘क्या बात करते हैं सर. हम हैं ना! इसलिए तो गार्ड लोग को नहीं लाए. नक्सली अब बहुत कम हैं. उनका आम लोगों से दुश्मनी नहीं है सर! प्रशासन से है. पुलिस देख के भड़कता है उ लोग. वैसे अब कहां बचा है नक्सली लोग?...है भी तो दोगा-बिल में कहीं लुकाया रहता है. समझे कि नहीं!’
पत्थर के बीच पानी कितना पारदर्शी था! एक छोटी-सी नदी की तरह. पानी की आवाज के बीच थे हम. हमारी और आस-पास के लोगों की बातचीत से बेखबर आगे गहरे कुंड में पानी के गिरने और उससे उठे धुंआरे थे! लग रहा था पानी के ये धुंआरे जैसे इस चांदनी रात में सफेद बादल की तरह तैर रहे हैं.
‘मटन बहुत टेस्टी बनाए हो पांडेय,’ बहुत देर से चुप बैठे सहनी सर के बोल फूटे. उनका तीसरा पैग था. ‘अब लगता है सर आप मोर्चा संभाल लेंगे’ ‘ओ भाई साकेत! हम कब पीछे रहे हैं? हम पहले पुलिस विभाग में क्लर्क थे और पुलिसया रौब दाब तो वहीं से सीख गए हैं महाराज!’
‘हां वो तो है सर! आपकी तो बात ही अलग है. तो पांडेय शुरू करो डी.एफ.ओ. सर की कहानी. सुना है तुम सब कुछ जानते हो.’
‘हां सर! बताते हैं. पूरा रात तो यहीं न रहना है सर. हमरा पास कोनो खिस्सा कहानी के कमी है!’
ज्यों-ज्यों रात बढ़ती जाती है, जंगल और पहाड़, झरने का धुआंरा और नदी की कल-कल और अद्भुत लगने लगती है. भीतर एक सिहरन हो रही है. ‘डी.एफ.ओ. संजय सिंह सर बहुत निडर आदमी थे. उनकी निडरता ही उन्हें ले डूबी. सर एक बात कहें ईमानदारी भी कभी-कभी एक रोग बन जाता है. अवैध कटाई और अवैध खनन को कोई आज तक रोक पाया है सर!’
‘क्या बात कर रहे हो पांडेय?’
‘बुरा मत मानिएगा सर! ठीक है अफसर लोग को हम बेईमान नहीं कह रहे हैं पर आपको क्या लगता है एम.पी., एम.एल.ए. और मिनिस्टर-चीफ मिनिस्टर सब का शह नहीं रहता है इ सब में! बड़ा-बड़ा कंपनी का प्रोजेक्ट में स्वीकृति नहीं रहता है उन लोगों का? कमीशन नहीं जाता है? कभी निजी फंड में कभी पाटी फंड में! आएं? बोलिए कि हम गलत कह रहे हैं’.
हम लोगों को लगा कि चंद्रहास पांडेय ऑपरेटर होते हुए भी मुंहलगा हो गया है. पहले के अफसर ने चेताया था. सेवा लेना उससे. खूब करेगा. लेकिन सावधान.’ ‘ऐं चुप कर पंडेवा! एस.के.एम. साहब जो कहानी सुनना चाहते हैं उसे ही कहो, बाकी ढेर कबिलाठ मत बनो.’ ‘हाऊ सर! साॅरी सर. सर जी! दरअसल एम.पी. साहब का ही इ धंधा चलता है. इ बात एस.पी. साहब भी जानते हैं और डी.एम. साहब भी. डी.एफ.ओ. साहब को ट्रैप में फंसाने और नक्सलियों की कहानी गढ़ने का प्लान उन्हीं का था. चलने नहीं दे रहे थे ना.’
पत्थर के पास की चटाई पर लेटे-लेटे पुरवइया की ठंडक से मुझे नींद आने लगी थी. नींद मुझसे सवाल करने लगी. मुझे मंदिर के पुजारी और चंदन पहाड़ी की मस्जिद के मौलवी की बहस दिख रही है. हर ओर जैसे आग लगी हो. एक लाल नाक वाला जोकर सब चीज देख रहा है और मजे ले रहा है. पहाड़ी पर खिले जंगली फूल अचानक झुलस गए हैं. कई लोग चीख चिल्ला रहे हैं. एक बुर्का पहने लड़की मुझे चुनौती दे रही है.
‘नफरत है तो इतने प्यार की बातें कैसे कर लेते हो?’
‘...’
‘अच्छा ये तुम्हारा पेशा है? हां! तुम कसमें भी अच्छी खा लेते हो. कोई भी विश्वास कर लेगा और अपना गुर्दा चीर के रख देगा तुम्हारी इस मासूमियत पर!’
‘...’
‘उस मोटी-सी संविधान की किताब में लिखे की दुहाई देते हुए तुम्हें शर्म महसूस नहीं होती?’
‘...’
‘अच्छा तुम तो उसमें लिखे हर्फ को दिन रात मिटाते हो. अब न उगेगा वो सूरज तुम्हारे सामने जिसे तुम वतन कहते हो. तुम सोज हो अपने वतन के!’
‘...’
‘तो तुम वहां रहते हो?’
‘...’
‘एक बात बताओ. पहले मुर्गी थी या अंडा? पहले आग थी या धुआं,’
‘ये कैसा सवाल है?’
‘हां, बताओ!’
‘मुझे नहीं पता’. ‘हां ये कहो ना. तो तुमको क्या लगता है ये ईंटें सिंधु घाटी से लाई जा रही हैं? तुम्हारा महामंत्राी जाॅन मार्शल हुआ जा रहा है? सिंधु घाटी की ईंटें किस साइज की थीं? क्या ये जो ईंटें ढो रहे हो, एक सुंदर कपड़े से ढककर मोहनजोदाड़ो से उठाकर ला रहे हो? क्या इनका भी पूजन हुआ है?’
‘तुम क्या समझ रहे हो महामंत्राी साधारण आदमी है? शेर है शेर! खंती गला देता है पेट में, मस्जिदों की नींव हिला देता है, एक धक्के में गुंबदों को तोड़ देता है. इतिहास बदलने चला है वो.’
‘इतिहास से छेड़छाड़ मत करो, इससे किसी का भला नहीं होने वाला.’
‘हां, सही कह रहे हो. हम छेड़छाड़ कर रहे हैं! और तम्हारा मुल्ला वो मौलवी तन्खा खां! उसने अशोक के लघु शिलालेख को बंद कर रखा है. ताला उसने अपने बाप के परमिशन से लगाया था? एक हिंदू सम्राट का आदेश था वहां.’
‘उस अभिलेख को संरक्षित रख रहा है वो. जिस पर किसी ने ध्यान तक नहीं दिया. बड़े आए.’
‘अच्छा! इतना भोलापन लाते कहां से हो भाई! वो हिंदू धरोहर को नष्ट कर रहा है. उसे ढक कर. उसे छुपा रहा है. वह तो शेरशाह को आगे बढ़ा रहा है. दिन रात शेरशाह का बखान करता रहता है. उस पहाड़ी पर कब से है मस्जिद? क्यों है मस्जिद? इस पहाड़ी पर कभी सम्राट अशोक ने लेख खुदवाए होंगे ताकि उसकी प्रजा उस लेख को पढ़ सके.’
पांडेय मुझे झकझोरकर जगाता है, ‘सर सुबह की धूप उगने से पहले इस झरने के पानी को देखिए. सब उसी के लिए आता है सर.’ ‘हां.’ ‘फिर कुछ ऊटपटांग देख रहे थे क्या सर?’ अब चंद्रहास पांडेय भी यह जानने लगा है. ‘हां पांडेय. कभी खाली नहीं रहता है मेरा दिमाग. मैं अब थक चुका हूं अपने ही मन से यार.’ यार शब्द से पांडेय चैंका और फिर मेरी ज्यादा केयर करने लगा, ‘मुझे पकड़ के चलिए सर, पत्थर आड़े-तिरछे हैं. खूब ऊबड़-खाबड़ है इधर.’
‘और लोग कहां हैं पांडेय?’
‘सब लोग पहले ही उठकर वहां चले गए हैं सर.’
नींद में देखी गईं सारी वे बातें उमड़-घुमड़ रही हैं. कड़ी दर कड़ी घटनाएं जुड़ती जा रही हैं. चंदन पहाड़ी पर उर्स मेले के समय जिला अल्पसंख्यक कल्याण पदाधिकारी के साथ गया था. पहाड़ी की गुफा में बंद अशोक के लघु शिलालेख उसने मौलवी से खुलवा के दिखाए थे.
मुझे अपने गांव के शिक्षक हाजी हशमतुल्ला की याद आ रही है. पूरे इलाके में लोग उन्हें जानते थे. सब उन्हें शिक्षक के रूप में आदर देते थे. किसी ने यह नहीं कहा था कि वे मुसलमान हैं. वे शहर के उस लाॅज में आए जहां मैं रहता था. एक कमरे में मैं और मेरा रूम पार्टनर और एक सिंगल कमरे में उमेश अंकल. उमेश अंकल ने मुझे बुलवाया था. लाॅज आॅनर का बेटा हमारा हमउम्र था और हमसे हमेशा मजाक के मूड में रहता था. उसने कहा ‘जाओ तुम्हारा ससुर आया है. सफेद दाढ़ीवाला कटुआ’.
मैं चैंक गया. ऐसा तो कोई नहीं मेरे परिवार में. जब वहां गया तो देखा कि वहां हाजी साहब हैं. हमारे घर कभी-कभी आया करते. पिता अक्सर पैर छू लेने को कहते. शायद आज पिता कान में फुसफुसा रहे थे. पैर छू लो. मैंने पैर छू लिए. ‘खुदा बरकत दे. बाबू कैसे हो? आते वक्त हड़बड़ी में आना पड़ा. आपके पापा से नहीं मिल पाया’.
उमेश अंकल ने कहा कि इन्हें ले जाओ अपने कमरे में. हाजी साहब क्षमा कीजिएगा मेरी एक सप्ताह बाद पी.सी.एस. की परीक्षा है.
‘बाबू मुझे दो दिन अपने पास रख लो. मेरी बेटी आयसा की शादी के लिए जिस लड़के को हमने पसंद किया है उसकी नौकरी के लिए पैसे देने हैं बोर्ड में.’ उन्होंने थैला दिखाया. ‘ज्यादा है बाबू और कहीं नहीं जा सकते.’
पता नहीं मुझे उस दिन क्या हुआ था कि मैंने उन्हें मना कर दिया. शायद कुदुस मियां का गुस्सा उतार रहा था जिसके बारे में अपने इलाके में डकैती के किस्से सुनता था या मकान आॅनर के बेटे शुभंकर राय और उसके दोस्तों की वे बातें. जो मुस्लिम मोहल्लों और गोकसी तथा पाकिस्तान और इंडिया के क्रिकेट मैच के मामले में पूर्वाग्रह भरी हुई थीं.
हमने उन्हें उस फ्लोर की बालकनी से नीचे गलियों में जाते हुए देखा. वे दोनों आदमी सिर झुकाकर जा रहे थे.
रातभर चांदनी रात में झरने के पास रहने की हमारी इच्छा पूरी हुई. हम लौट के आते हैं. मैं अपने कमरे पर जाकर नहा-धोकर आराम करने की मुद्रा में आता हूं. झरनों, पहाड़ी नदियों और चांदनी रात का बिंब मेरी आंखों में अभी भी तैर रहा है. रात्रि के जागरण का असर अब भी आंखों में हावी हो गया है. मुझे नींद तो नहीं आ रही पर स्मृतियों में गड्डमड्ड-सा कुछ चल रहा है.
इंग्लिश स्पीकिंग कोचिंग सेंटर में हिचक-हिचक के साथ अंग्रेजी बोलना सीख रहा हूं सो क्यूट मैम...मिसेज अनीता दत्ता.माई गाॅड, सी इज सो इंटेलीजेंट एंड गोर्जियस. मुझे लगा कि इसी मैडम से मैं स्पोकन इंग्लिश सीख सकता हूं और किसी से नहीं. खचाखच भरी क्लास में मैम ने मुझे एक मुस्लिम लड़की के ग्रुप में डाल दिया. बट शी वाज क्वायट शाय. अगले दिन मैं जब क्लासरूम पहुंचा वहां सिर्फ आसिमा थी. गुलाबी सूट में. उसने कहा यहीं बैठो. मैं उसके बगल में बैठ गया. बस बैठा ही था कि उसने मेरे होठों पर अपने हांेठ रख दिए. हम एक गहरे चुंबन के आनंद से गुजर रहे थे. मेरी देह के सारे रोंगटे खड़े हो गए थे. ऊफ! ‘लवली लिप्स.’ बस इतनी ही इंग्लिश मेरे मुंह से निकली. बाहर आहट सुनकर हम अलग हुए.
शकील ने ही मजाक-मजाक में कहा था, ‘दोस्त मेरी इच्छा है कि मैं हिंदू लड़की से शादी करूं और तुम किसी नाजनीन मुस्लिम लड़की से शादी कर लेना.’
शाम को शकील का फोन आया. मैं पहली बार उसके घर गया करीमनगर. उसके घर की हालत देखकर लगा कि वह गहरे आर्थिक दबाव में है. शकील के घर ट्रांसपोर्ट के दो छोटे-छोटे पिकअप वैन खड़े हैं. उनमें से एक गाड़ी जानी-पहचानी लग रही है.
‘बी.आर...2909 किसकी गाड़ी है शकील?’
‘मेरी ही है. लोन पर लिया था दोस्त. पर अभी तक चुकता नहीं हुआ है. कभी भी बैंक वाले इसे खींचकर ले जाएंगे. पिछली दफा तुम्हारे विभाग के किसी खड़ूस आॅफिसर ने पकड़ लिया था. बहुत हर्जाना भरना पड़ा था. मैं यहां नहीं था. रहता तो उससे मिलता. मुझे क्या पता था कि तुम मेरे शहर में हो. नहीं तो तुमसे छुड़वा न लेता!’ वह हंसा. पर मेरा चेहरा फक्क पड़ गया. मैंने अपनी हथेली के प्वांइट को दबाकर अपनी बढ़ी हुई धड़कन को नियंत्रित करने की कोशिश की. डिजिट मुझे याद रह जाते हैं. इसलिए गाड़ी नंबर और फोन नंबर भी. इस गाड़ी का ड्राइवर कितनी चिरौरी कर रहा था. मैं सिर्फ शकील का चेहरा देखता रहा.
‘तुम्हारे अब्बू?’ ‘बड़ी दर्दनाक कहानी है दोस्त! आज पहली बार आए हो इसलिए दुख की बातें नहीं. वर्ना यह शहर खूंखार और बेदर्द बन चुका है. पर दोस्त तुम नहीं बदले और न तुम्हारी नाक.’
हम बस बेमतलब ठहाके लगा रहे हैं.
‘तुम्हें नहीं पता दोस्त कि मैं कितना बदल चुका हूं!’ मैं यह बोलता नहीं सिर्फ सोचता हूं.
‘बिरयानी बहुत टेस्टी है. हैदराबादी बिरयानी भी इतनी लजीज नहीं होती.’
बिरयानी खाकर मेरा मन तृप्त हो चुका है. मैंने लौटने के लिए ड्राइवर को फोन किया है. वह शायद आसपास ही था. वह गाड़ी लेकर आ गया है.
‘तुमने अम्मी से नहीं मिलाया?’
‘नहीं मिला पाऊंगा दोस्त!’
उसकी आंखें नम हैं. वह मुझसे लिपट गया है. उससे छूटकर मैं गाड़ी में बैठता हूं.
लौट रहा हूं. गाड़ी का शीशा नीचे कर दिया है मैंने. हवाएं सुकून दे रही हैं. सड़कों पर एक अजीब-सा शोर है. गाड़ियों के टायर की आवाजें. हवाओं का घर्षण. रोशनी की ज्यादती हर ओर फैली है.
कुछ ही देर में मैं शहर के बीचों बीच से गुजरते हुए अपने कमरे में दाखिल होऊंगा और बालकनी में बैठकर मेरा समय गुजरेगा खुद को कोसते हुए नींद की प्रतीक्षा करते हुए. वैसी नींद जो किसी नई बेचैन दुनिया में मुझे ले जाएगी एक हत्यारे की तरह.
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